Wednesday, December 14, 2022

 गुफ्तगू करने के मैयार हैं। 

1 कोई सिर्फ कुरान को कुरान से समझना चाहता है।

2 कोई कुरान और सही हदीस से समझना चाहता है।

3  कोई कहता है कुरान और सारी हदीसे ठीक है।

4 कोई कहता है कुरान और उसके फिरके की हदीसे ठीक है।

5  कोई अपनी मजहबी रसूमात को कंडेम्न नहीं करता और जो चलता रहा है उसको सही मानता है।

6 सब अपने चहेते महापुरुषों को दूसरे के चहेतों से अफजल मानते हैं।

7 कोई प्रकृति को सही मानता है।

8 कोई कहता है के इंसानों के साथ ठीक रहो भले ही इबादतों पर ध्यान न दो कोई कहता है भले ही इंसानों के साथ भलाई ना कर पाओ लेकिन इबादत में पक्के रहो कोई कहता है दोनों काम करते रहो।।

9 कोई यह कहता है कि कुरान के सही मानी अरबी जानने वाला ही समझ सकता है फिर कहता है कि यह वह अरबी है जो क्लासिकल है जिसे आज का अरब नहीं समझ सकता। फिर डिक्शनरी के जरिए उसके सही मानी निकालकर कुरान को नए तरीके से तर्जुमा करता है। एक जगह वो चमत्कार को स्वीकार करता है दूसरी जगह इंकार कर देता है।

10 इसी तरह से शख्सियत परस्ती को लेकर बहुत से लोग जज्बाती हो जाते हैं कोई किसी नबी, सहाबी, इमाम को लेकर जज्बाती है और अपने चहेते की तारीफ में दीवाना है उसके अलावा कुछ सुनने को तैयार ही नहीं है भले ही इनकी पारिवारिक जिंदगी है या सामाजिक जिंदगी है डिस्टर्ब है।

11 इसमे एक पहलू यह भी है कि कुछ लोग किसी के चहेते महापुरुष को तनकीद का निशाना बनाते हैं। उससे भी कोई नतीजा नहीं निकलता है।

तो हम जब कोई गुफ्तगू या डिस्कशन करते हैं तो उसके लिए यह ख्याल रखना चाहिए कि उसे हमें उससे हमें किस तरह का फायदा होगा?

क्या इससे कोई माली फायदा हो रहा है या इससे कोई  ज़हनी सुकून मिल रहा है 

या मुखालिफ फ़िरके को जलील करने में मजा आ रहा है 

या इससे कोई निजाम कायम करने में आसानी हो रही है जिससे सारे इंसानों को फलाह हासिल हो।

कोई शख्स बातचीत के दौरान किसी महापुरुष या किसी पुस्तक पर कोई सवाल उठाएं तो उस सवाल का जवाब ही देना चाहिए।  उससे अगर आप यह पूछते हैं कि तुम पवित्र पुस्तक को मानते हो? खुदा को मानते हो? या मेरे वाले महापुरुष को मानते हो? 

तो इसका मतलब यह है कि आपके पास जवाब नहीं है। 

क्यूंकी अगर मानना ही बुनियाद है तो फिर उसपर दलील का कोई मामला नहीं बनता।  

आपके पास अकीदा और आस्था है जो आप दूसरे पर थोपना चाहते हैं तो अब वो माहौल नहीं रहा है।

और आपके पास उस दलील का जवाब नहीं है तो इसका तरीका ही है कि यह कहा जाए कि मेरा उनमें अक़ीदा है मैं आपसे बात नहीं कर सकता।  मेरे पास जवाब भी नहीं है इसलिए माफी चाहता हूं । 

गली गलौच करने से बेहतर है कि आप या तो ग्रुप से निकल जाइए या उनको आउट कर दीजिये। 

गुस्से का मतलब है आपके पास दूसरे को समझाने के लिए अलफाज नहीं है या आपके पास जवाब नहीं है।

अपनी रेडीमेड मान्यता के साथ जब आप गुफ्तगू मे शामिल होते हैं तो आप अपने साथ ज्यादती करते हैं। आप इस इंतज़ार मे रहते हैं कि आज नहीं तो कल यह मेरे टोले  मे शामिल हो ही जाएगा।

आदमी अपने फिरके से इसलिए जुड़ा रहता है क्यूंकी वो दूसरे फिरके से डरता है कि कहीं यह मेरे अकीदे का बैंड न बजा दे। ऐसे डरपोक लोग तहक़ीक़ नहीं कर सकते। अकीदे से आप साबित नहीं कर सकते कि आप सही रास्ते पर हैं। अकीदे के अंदर रहने वाला भीड़ मे गुंडा और अकेले मे डरपोक होता है।

अगर गुफ्तगू को ऐसा बनाया जाए जिससे दुनिया का हर इंसान शामिल हो सके तो उसके लिए यह शर्ते होनी ज़रूरी हैं। वरना अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग

1- बात जो कही जा रही है उसका वजूद हो रहस्य मे न हो।

2- बात तार्किक हो, तर्क के जरिये समझाई जा सके।

3- पूरी दुनिया मे लागू की जा सके।

4- हर दौर मे लागू की जा सके। 

4- समझी जा सके।

5- समझाई जा सके।

6- तालीम मे लायी जा सके। 

7- उसको अपनी ज़िंदगी मे सब लोग जी सके। मैकानिकल कर्मकांड न हो।

इसके अलावा जो भी कुछ है वोह आस्था है। 



 

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