Monday, March 18, 2024

 देखने में आता है कि  हमारे समाज में जो भी विशेष को पूजता है या किसी भी विशेष के प्रभाव में है वह सत्य को देखने में असमर्थ होता है.

Friday, June 30, 2023

 

यह  बहस हमेशा रहती है कि कुर्बानी की शरई हैसियत क्या है? जो लोग बहस करते हैं उनके बहस के आधार भी अलग अलग क़िस्म के होते हैं।

इस बहस मे तीन क़िस्म के लोग मुख्य रूप से होते हैं।

जज्बाती लोग

यह वो लोग हैं जो मजहबी रसूमात से प्रभावित नहीं होते। यह नर्म दिल के लोग होते हैं। गोश्त खा लेंगे लेकिन जानवर हलाल नहीं कर सकेंगे। इनमे से कुछ गोश्त खाने वाले नहीं भी होते हैं।

सड़कों पर बहता खून, एक जानवर को उसके जीने के अधिकार से महरूम करना, गोश्त के लिए जानवर को खस्सी करना इत्यादि।

तार्किक लोग

1)     यह घटनाओं को तर्क  बुनियाद पर तोलते हैं और जिसमे वो कुरान, हदीस, तारीख मजहब और संस्कृति को वास्तविकताओं के आधार पर तोलते हैं।

2)     कुर्बानी के ज़िमन में उनके यहाँ तर्क हैं कि इब्राहीम के इतने पुराने किस्से की क्या हक़ीक़त है? क्या खुदा ख्वाब मे आकार ऐसे मांग सकता है। ख्वाब की शरई हैसियत क्या है?

3)     अगर ख्वाब आया था तो उसकी तसदीक़ कैसे की इसमाईल ने।

4)     क्या इस उम्मत को ख्वाब आया है जो यह लग गई कटान पर? अगर अल्लाह पर यकीन है तो अपना लड़का रख छुरी के नीचे। अगर अल्लाह चाहेगा तो कटरा आ जाएगा तेरे बेटे के छुरे के नीचे।

5)     वहाँ दुंबा आया था आपने ऊंट, भैंस, कटरा और बकरा क्यूँ कर दिया? आपने जानवर क्यूँ बदला?

6)     अगर अल्लाह गैब का हाल जानता है तो उसने यह इम्तिहान क्यूँ लिया?

7)     कुरान मे दिखाइए

8)     हदीस मे दिखाइए

9)     तारीख मे दिखाइए

 

मजहबी लोग

यह बहुत पचड़े में नहीं पड़ते। इनको खानदानी तौर पर आदत पड़ी होती है उसके खिलाफ जाना इनके लिए मुश्किल होता है और खुदा का खौफ और समाज मे इज्ज़त का मामला होता है।

यह अपने मुताले से बचते हैं इन्हे अपनी ज़ाती अक़ल पर कम भरोसा होता है। यह अपने जैसे माल और दौलत जमा करने वाले उलमा के भक्त होते हैं। यह चालाक लोग पैसे से समाज मे रुतबा और आखिरत मे अपनी जन्नत पक्की किए रहते हैं। मस्त रहते हैं।

इनको आप कुरान मे दिखा दीजिये या हदीस या तारीख मे, इन पर फर्क नहीं पड़ता। यह लकीर के फकीर बने रहते हैं। हाँ कोई सरकारी डंडा इस पर पड़े तो वो बिलबिला उठते हैं। मगर इनके तौर तरीके पर कोई फर्क नहीं पड़ता। इस सब बातों का एमएससी या पी०एच०डी० होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। इसका ऐसे ही है जैसे देसी घी फूँक कर आर्य समाजी वातावरण शुद्ध करने की दलील देते हैं।

 

इनसे अगर

क्या आपने कुरान मे इसका क्लियर हुक्म देखा है? या सुनी सुनाई बातों पर अमल किए जा रहे है? क्या हाजियों के अलावा के लिए कुर्बानी का हुक्म है?

क्या हदीस से इसका ऐसे ही वाजिब होना साबित जैसा आप कर रहे हैं?

क्या खलीफा राशिदून ने इस अमल को हर साल ऐसे ही किया जैसे हम करते आ रहे हैं?

 

कुर्बानी की शरई हैसियत को वाजिब, सुन्नते मुअक्किदा, सुन्नत या म्सुताहिब, तबई, बिदअत, मकरूह, फिजूलखर्ची साबित करने वाली जमातें हैं। आपका क्या रुझान है?

इधर तो तो सबके मतलब का सामान मौजूद है। आप किसी तरफ भी खड़े हो सकते हैं।

एक जमात उसके जज्बाती पहलू को लेकर कुछ कहना चाहती है।

एक ग्रुप जानवर के गोश्त को खाने को लेकर उससे होने वाले स्वास्थ्य के खराब होने को लेकर चिंतित दिखाई देता है। हालांकि बीड़ी सिगरेट, गुटका या  शराब को लेकर चिंतित नहीं होता।

एक ग्रुप कुर्बानी के खर्च को दूसरी जगह लगाने की वकालत करता  नज़र आता है। इसमे वही बात है कि और जगह जो खर्चे होते हैं उस पर वो अपना मुंह नहीं हिलाता। भाई आपको जन्म दिन पर होने वाले खर्च मे कोई परेशानी नहीं दिखाई देती। आपको उसमे मज़ा आता है हमें इसमें मज़ा आता है। ऐसी दलील देते हैं। केक के काटने को कटरे के कटने के बराबर समझने वाले लोग भी हैं।

कुर्बानी करने के पक्ष मे लोग दलील देते हैं कि इससे  अर्थव्यवस्था को कई फायदे हैं

आस्थावादी को यह तर्क देना नहीं चाहिए। वो तो यह कहे कि हज़रत इब्राहीम की सुन्नत है मैं तो हर हाल मे करूंगा। क्यूंकी अगर अनाज के वितरण का मामला अगर कर लिया जाए तो वो ज़्यादा दिन चलेगा, मुहल्लों मे सड़ांध और बदबू का तूफान भी नहीं उमड़ेगा। तीन दिन गरीब को ऐश करवा कर बाक़ी दिन उसको भूखा छोड़ दो।

फिर यह भी दलील कि जानवरों की संख्या कंट्रोल मे रहती है। चीन मे जो भी खाया जाता है वो कभी कम नहीं पड़ता। खिंजीर पूरे यूरोप मे खाया जाता है वो भी खूब पैदा होता है।

 

 

Sunday, February 26, 2023

 दीन को लेकर बहुत सी बातें मनुष्य में व्याप्त हैं.

जा इन्सान ने इस ज़मीन पर पर रखा तो उसके सामने जानवर, मौसम और अपने जैसे इन्सान से ख़तरा था.

जानवर से बचने के लिए उसने हथियार बनाये और मकान बनाये.

मौसम के खतरों से बचने के लिए उसने मकान, पंखे, कूलर और ac बनाये.

इंसान से खतरे से बचने के लिए इंसान ने कबीला. राजा और प्रजातंत्र का निर्माण किया.

एक समस्या यह थी कि आदमी मरना नहीं चाहता. इसके लिए उसने मरने के बाद की ज़िन्दगी पर विचार किया और धर्म का उदय हुआ.

सांप, नेवला, हाथी, बादल, पूर्वज, हवा, सूरज, असमान और सातवें सामान पर बैठा अपने जैसे खुदा का अविष्कार किया.

अपने अमल की गलती के लिए किस्मत, शैतान, अल्लाह, नफस इत्यादि को ज़िम्मेदार ठहराया.

कब नाराज़ हुआ.

आदमी को अपने मरने के बाद का मालूम न होने की वजह से उसने अनदेखे खुदा पर यकीन किया और मरने के बाद की ज़िन्दगी को ठीक करने के लिए खुदा को खुश करने का घनघोर प्रयास किया. और यह मालूम नहीं कि वोह कब खुश हुआ और कब नाराज़ हुआ.

खुदाई को हैंडल करने के लिए समाज में एक टोला तैयार हुआ जिसे मुल्ला, पुरोहित वगरह के नाम से जानते हैं.

यह टोला बहुत चालक होता है यह सरकार, सरमायादार और बदमाशों से साठ गाँठ करके अपने उल्लू सीधा करता है.

यह आमतौर से हरामखोर टाइप का ग्रुप होता है जो धर्म की शिक्षा का सौदा करता है.


Wednesday, December 14, 2022

 गुफ्तगू करने के मैयार हैं। 

1 कोई सिर्फ कुरान को कुरान से समझना चाहता है।

2 कोई कुरान और सही हदीस से समझना चाहता है।

3  कोई कहता है कुरान और सारी हदीसे ठीक है।

4 कोई कहता है कुरान और उसके फिरके की हदीसे ठीक है।

5  कोई अपनी मजहबी रसूमात को कंडेम्न नहीं करता और जो चलता रहा है उसको सही मानता है।

6 सब अपने चहेते महापुरुषों को दूसरे के चहेतों से अफजल मानते हैं।

7 कोई प्रकृति को सही मानता है।

8 कोई कहता है के इंसानों के साथ ठीक रहो भले ही इबादतों पर ध्यान न दो कोई कहता है भले ही इंसानों के साथ भलाई ना कर पाओ लेकिन इबादत में पक्के रहो कोई कहता है दोनों काम करते रहो।।

9 कोई यह कहता है कि कुरान के सही मानी अरबी जानने वाला ही समझ सकता है फिर कहता है कि यह वह अरबी है जो क्लासिकल है जिसे आज का अरब नहीं समझ सकता। फिर डिक्शनरी के जरिए उसके सही मानी निकालकर कुरान को नए तरीके से तर्जुमा करता है। एक जगह वो चमत्कार को स्वीकार करता है दूसरी जगह इंकार कर देता है।

10 इसी तरह से शख्सियत परस्ती को लेकर बहुत से लोग जज्बाती हो जाते हैं कोई किसी नबी, सहाबी, इमाम को लेकर जज्बाती है और अपने चहेते की तारीफ में दीवाना है उसके अलावा कुछ सुनने को तैयार ही नहीं है भले ही इनकी पारिवारिक जिंदगी है या सामाजिक जिंदगी है डिस्टर्ब है।

11 इसमे एक पहलू यह भी है कि कुछ लोग किसी के चहेते महापुरुष को तनकीद का निशाना बनाते हैं। उससे भी कोई नतीजा नहीं निकलता है।

तो हम जब कोई गुफ्तगू या डिस्कशन करते हैं तो उसके लिए यह ख्याल रखना चाहिए कि उसे हमें उससे हमें किस तरह का फायदा होगा?

क्या इससे कोई माली फायदा हो रहा है या इससे कोई  ज़हनी सुकून मिल रहा है 

या मुखालिफ फ़िरके को जलील करने में मजा आ रहा है 

या इससे कोई निजाम कायम करने में आसानी हो रही है जिससे सारे इंसानों को फलाह हासिल हो।

कोई शख्स बातचीत के दौरान किसी महापुरुष या किसी पुस्तक पर कोई सवाल उठाएं तो उस सवाल का जवाब ही देना चाहिए।  उससे अगर आप यह पूछते हैं कि तुम पवित्र पुस्तक को मानते हो? खुदा को मानते हो? या मेरे वाले महापुरुष को मानते हो? 

तो इसका मतलब यह है कि आपके पास जवाब नहीं है। 

क्यूंकी अगर मानना ही बुनियाद है तो फिर उसपर दलील का कोई मामला नहीं बनता।  

आपके पास अकीदा और आस्था है जो आप दूसरे पर थोपना चाहते हैं तो अब वो माहौल नहीं रहा है।

और आपके पास उस दलील का जवाब नहीं है तो इसका तरीका ही है कि यह कहा जाए कि मेरा उनमें अक़ीदा है मैं आपसे बात नहीं कर सकता।  मेरे पास जवाब भी नहीं है इसलिए माफी चाहता हूं । 

गली गलौच करने से बेहतर है कि आप या तो ग्रुप से निकल जाइए या उनको आउट कर दीजिये। 

गुस्से का मतलब है आपके पास दूसरे को समझाने के लिए अलफाज नहीं है या आपके पास जवाब नहीं है।

अपनी रेडीमेड मान्यता के साथ जब आप गुफ्तगू मे शामिल होते हैं तो आप अपने साथ ज्यादती करते हैं। आप इस इंतज़ार मे रहते हैं कि आज नहीं तो कल यह मेरे टोले  मे शामिल हो ही जाएगा।

आदमी अपने फिरके से इसलिए जुड़ा रहता है क्यूंकी वो दूसरे फिरके से डरता है कि कहीं यह मेरे अकीदे का बैंड न बजा दे। ऐसे डरपोक लोग तहक़ीक़ नहीं कर सकते। अकीदे से आप साबित नहीं कर सकते कि आप सही रास्ते पर हैं। अकीदे के अंदर रहने वाला भीड़ मे गुंडा और अकेले मे डरपोक होता है।

अगर गुफ्तगू को ऐसा बनाया जाए जिससे दुनिया का हर इंसान शामिल हो सके तो उसके लिए यह शर्ते होनी ज़रूरी हैं। वरना अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग

1- बात जो कही जा रही है उसका वजूद हो रहस्य मे न हो।

2- बात तार्किक हो, तर्क के जरिये समझाई जा सके।

3- पूरी दुनिया मे लागू की जा सके।

4- हर दौर मे लागू की जा सके। 

4- समझी जा सके।

5- समझाई जा सके।

6- तालीम मे लायी जा सके। 

7- उसको अपनी ज़िंदगी मे सब लोग जी सके। मैकानिकल कर्मकांड न हो।

इसके अलावा जो भी कुछ है वोह आस्था है। 



 

Tuesday, December 13, 2022

भविष्य को लेकर बहुत सी संकल्पनाए समाज मे व्याप्त हैं, लेकिन जो संकल्पना मैं आपको बताने जा रहा हूँ इसमे बात समझने की यह है कि हर रास्ता चुनने का एक नतीजा है। रास्ता चुनने के लिए मानव स्वतंत्र है लेकिन उसके नतीजे के लिए स्वतंत्र नहीं है। हर अमल का एक नतीजा है। जब हमें नतीजे का पता नहीं होता है तो हम परेशान होते हैं। 
शरीर सुख संबंधी सुखों को लेकर जो चाहत है उनमे अधिकतर यही होता है। उन सुखों को लेकर जो निरंतर सुख कि कल्पना हमने ईजाद कर रखी है वो इस सदी कि सबसे दुखड़ायी स्थिति है। मानव का मानव से संबंध बिखरने के स्तर पर है।